दही हंडी निर्बंध:क्या भारत के 80% लोगो को स्व- तंत्र मिला ?

 

दही हंडी निर्बंध :
आज कोई भी हिंदू श्रद्धा पर हमला करता है और कानून कि मदत से परंपरा को कुचल देता है गिने चुने लोग और संघटना के अतिरिक्त उन्हे कोई विरोद्ध भी नही करता ,क्यू की स्वतंत्रता के बाद बनाई गयी व्यवस्था ने हिंदू वो के मन मे अपनी ही संस्कृती के प्रती ऐसी हीनत्व(अपराधित्व ) कि भावना भर दि है, कि हिंदू प्रतिकार शून्य हो गये -मतलब तुम्हारे धर्म -संस्कृती मे सब कुछ गलत है, इस झूट का प्रचार और प्रसार प्रशासन ,मिडिया ,और उनके पाले हुवे लेखक तथा बुद्धिमान कहे जाणे वाले लोगो ने बडे ही धुर्तता से किया .यह लोग हिंदू वो को कभी हिंदू नही कहते,इसके बजाय ,RSS,संघी ,कहते है शनी मंदिर परंपरा बचाने वालो को सिर्फ ''गाव वाले'' कह कर उनकी संख्या सीमित है ऐसा जताते है , लेकीन हिंदू परंपरा तोडणे पर जो आमादा है उनके लिये बडा संख्यावाचक विशेषण जैसे नारी शक्ती, ''देश कि जनता'' आदी शब्दो का इस्तेमाल करते है . हिंदू संस्कृती को निष्प्रभ करणे के लिये ऐशी चालाकी १९४७से हि शुरू की गयी है . शायद इसी के तहत बडी हुशारी से हिंदू-संस्कृती का द्वेष करणे वाले नेता को 'संविधान 'रचेता बनाया गया .अगर ये झूट होता ,तो मुस्लीम पर्सनल कानून को भी हात लगाकर उनके धर्म मे भी हस्तक्षेप किया जाता लेकीन वास्तव मे इसके ठीक विपरीत होते दिखता है. समान नागरी संहिता के बारे मे आज तक कि सरकारे यही कहती आयी है कि ऐसा कानून सिर्फ मुसलमानो के सहमती से हि बनेगा . 
दुनिया का हर देश अपनी अपनी संस्कृती को संविधान और प्रशासन मे समिलीत करता है,ब्रिटेन को प्रजातंत्र कि जननी माना जाता है . लेकीन वहा पर आज भी ''क्वीन'' जो राजशाही का प्रतिक है उसे केवल उनकी परंपरा का समान करणे के लिये सिर्फ बरकरार हि नही रखा ,अपितु उसके नाम पर , राष्ट्र का कारोबार किया जाता है . भारत हो या नेपाल इन देशो के सांस्कृतिक वंशज (वारीश ) सिर्फ हिंदू है,लेकीन ''राष्ट्र और संस्कृती के बीच मे जो संबध होता है ,उसका ज्ञान बहोत कम हिंदुवो को होता है ,इसिका फायदा देश विरोधी और स्वार्थी तत्व उठाते है ,वास्तव मे जिस भूमी पर जो संस्कृती आपने आप बनती है उसी संस्कृती का वह राष्ट्र होता है यह नियम दुनिया भर मे लागू है,क्यू कि यह निसर्ग निर्मित व्यवस्था है ,यह व्यवस्था सुक्ष्मजीव जंतू वो से लेकर हर प्राणी मे पायी जाती है . अपना इलाका सभालने की ,उसेअपने शरीर गंध (बाघ शेर मल मूत्र से अपने इलाखे कि सीमा बना ते है )से अंकित करणे कि प्रेरणा होती है . धब्बे नुमा बक्टेरिया कि कॉलोनी को  बक्टेरिया ''कॅल्चर'' हि कहते है
भारत स्व-तंत्र हुवा .लेकिन क्या सचमुच 80% लोगो को स्व- तंत्र मिला ? जी नही देश को मिला नेहरू-आंबेडकर तंत्र यांनी नेआ तंत्र . हमारे पूर्वजो की जीवन और शासन के बारे मे जो समझदारी या ज्ञान था उसको  को संविधान से दूर रखने या  निकालने के पहले क्या किसीने जनता से पुछा था? क्या लोगो से जनादेश लिया था ? नही तो फिर ये लोग प्रजातंत्र वादी  कैसे हो गये ?  बुरी हो या भली हो हिंदू संस्कृती तब तो ९०% लोगो कि थी-उस संस्कृती पर थोडा बहूत नया संस्कार कर के संविधान बनता तो आज ना हिंदू वो के पूजा पद्धती -
(जैसे -शनि मंदिर -नारी प्रवेश अगर इस बात पर हिंदू नारी जनमत लिया तो ९९. ९९% हिंदू नारीया परंपरा के पक्ष मे मत देगी ,

लेकिन आंबेडकरकृत संविधान जो हिंदू संस्कृती नष्ट करणे के हिसाब से डिझाईन किया गया है उस पर आधारित कानून हिंदू परंपरा के विरुद्ध अगर ०.०९%लोग भी खडे होते है तो उनकी रक्षा करता है और प्रतिकार करणे वाले हिंदूवो को बेरहमि से खदेड देता है) पर न्यायालय हस्तक्षेप नही करता और ना ही कोई भारत माता कि जय कहने को /या वन्दे मातरम को चलेंज करता . आतंकवाद तो बहोत दूर रहता देश को खोकला करणे वाला आरक्षण वाद और उससे उत्पन्न करप्शन यांनी काँग्रेसवाद पनपता हि नही . यही व्यवस्था दुसरी तरफ देश हित के खिलाप जाणे वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ को हात भी नही लगाता- ख्रिस्चन और मुस्लिम संस्था वो द्वारा सरकारी खर्च पर उनकी धर्म और परंपरा कि शिक्षा देने का इंतजाम किया जाता है सिर्फ हिंदू परंपरा पर स्वयं घोषित संविधानरक्षक,मिडिया और कानून जब जब मोका

मिलता है टूट पडते है .  

भारत का संविधान  -वास्तव मे लोकमत नही है क्यू की जबसे यह संविधान बना है तबसे लेकर आज तक किसी भी लोकसभा चुनाव मे इसके नीर्हिन्दु करण पर जनादेश नही लिया गया. इसके विपरीत चुनाव मे देश के संस्कृती का मुद्दा लाना दंडनीय अपराध समझा जाता है क्यू की नेआ तंत्रवादी जाणतें है ,इस पर सारे हिंदू एक हो जायेंगे . तो डिझाईन ऐसा ही कि यह धोकाघडी लोग कभी भी समझे नही और किसी ने समझाने कि कोशिस कि तो वह होगया अपराधी ,जातीयवादी(इस व्यवस्था मे हर व्याख्या उलटी हो जाती है -जैसे -सब जातियो को एक करना = जातीयवाद ! )
आज भी सार्वमत लेलो . पता चल जायेगा . 
अच्छी हो ,बुरी हो ,अगडी हो ,पिछडी हो हिंदू संस्कृती ,हिंदुस्थान कि है और ऐसा कहने के लिये 80% (हिंदू)यह बहोत बडा आकडा है .( संविधान बनणे के पहले 90% थे) तो देश के 80% लोगो कि इच्छा ,आकांक्षा हि नही उनकी आस्था ,श्रद्धा ,जीवन जी ने का सिद्धांत ,उनके आदर्श (राम ,कृष्ण ),उनके वीर पुरुष(शिवराय ,राणा) और तत्ववेतावो (व्यास ,वाल्मिकी , जनक ,रावण ,विदुर ,धर्मराज ,और विशेषत:चाणक्य ) के विचारो पर संविधान बनता तो आजका हिंदुस्थान दुनिया भर के लिये एक आदर्श देश बनता . 
क्यू कि मनुष जाती के हजारो साल के जीवन पर  
किये गये प्रयोगो का सार जो संस्कृती है( दुनिया भर के विद्वान इसे मानते है .) उसकी जगह एक दो सत्ताभीलाषी नेतावो की तथाकथित विद्वता नही ले सकती.
 जनतंत्र  मे जो होना  चाहिये उसके ठीक विपरीत किया गया है . उद्देश स्पष्ट है 
१)हिंदू कभी एक ना हो 
२)वे अपनी हि धर्म संस्कृती का द्वेष करे 
)दुसरे संस्कृती और धर्म को अपना  समझे उन्हे  देश कि जमीन ,संपत्ती मर्जी खुषी से दे दे . और इस मूर्खता को मानवता समझे . 
४)अपने ही  पूर्वजोको मूर्ख और अत्याचारी माने और जीन लोगो ने धर्म के खातीर हिन्दुवो पर  अत्याचार किया उनके धर्म को ‘’मजहब नही शिखाता आपस मे बैर रखना’’माने.

हिंदूवो ने ऐसा कौनसा अत्याचार किया है तथाकथित (केवल एक,दो) पिछडी जाती पर ?आयसिस ,बोकोहरम जो आज कर रहे है वही पार्टीशन के समय और आज भी जारी है वैसा ?पुरुषोको मार कर स्त्रीयोको भगाया ?बांट लिया? मुंडिया कांटी?कत्ले  आम किया?  कौनसा अपराध किया ?क्यो हिन्दुवोंके के मनमें अपराधीत्व कि भावना भर दी गयी? सब झूट है .सारासार झूट है ,हिन्दुवोंने किसी भी जाती पार कोई अत्याचार नही किया है. जादा से जादा एक दुसरे को छुने से मना किया लेकिन ऐसा करणे से कोई मरता नही ,मरणा तो दूर खरोंचं तक नही आती  है.हिन्दुवोंने अत्याचार किया यह  दुष्प्रचार स्वार्थ प्रेरित है तथाकथित समता से इसका कोई लेना देना नही है.
 तुम्हारे पूर्वजो ने हमारे पूर्वजो पर अत्याचार किया इसलिये आज हमे नौकरीया और प्रमोशन बिना किसी शर्त या गुणवता के दे दो . यह मनवांना है ,
इसीलिये आज भी ‘’राई का पहाड़ बनाकर अत्याचारो के किस्से ,तथा  .अफ़वाहे फैलाई जाती है .क्यो कि जब ऐसे समाचार बंद हो जायेंगे तो हिंदू अपराधीत्व कि भावना से बाहर आयेंगे,और अन्यायकारक आरक्षण खतम  करणे कि मांग करेंगे. मतलब ऐसा तर्क सामने आयेगा कि कोई अत्याचार ना हुवा है ना हो रहा है तो आरक्षण क्यों ? सबको समान न्याय क्यो ना हो ?
हैदराबादी आत्महत्या का मृतक , दलित कहलाने  वाले जाती का था हि नही. लेकिन उसके मृत्यू पर ढिंडोरा आज तक दलित अत्याचार का ही  पिटा  जा  ऱ्हा है. 
सच को झुट और झूट को सच साबीत करणे की कोशिश  तमाम  मीडिया करता है .
हिंदू विरोधी व्यवस्था और गुट का एक प्रमुख पार्टनर मीडिया है . मीडिया वकील की तरह  ऐसे काम करता है जिसको क्रिमिनल लॉयर कहते है. सच्चाई कि वकालत कोई नही करता,उसको पैसा नही मिलता लेकिन चोर ,खुनी ,बलात्कारी को निर्दोष छूडाने वाले वकील को बहोत आमदानी होती है. यही कारण है झूट फैलाकर बार बार हिंदू संस्क्रुति को बदनाम करने  के मीडिया के  हिंदू विरोधी कारनामोका .                     
 पाप करणे से डरने  वाला-पापभिरू  हिंदू हि था इस लिये भारत का क्राईम रेट दुनिया मे सबसे कम था वो आज हिंदुत्व भावना को जिस अनुपात मे  क्षीण किया जा ऱही  है उसी  अनुपात मे बढ रहा है.हिंदू व्यवस्था को जांन बुझकर नष्ट किया जा रहा है . और यह सिलसिला जब तक हिंदू एक होकर अपना प्रशासन (व्यवस्था )नही लायेंगे  तब तक जारी रहेगा .                          

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