नथुराम क्या कहना चाहता था ? पार्ट -१
नथुराम क्या कहना चाहता था- पार्ट -१
दर असल आज जो हो रहा है इसका मूल गांधीवाद नामक पाखंड मे है,जिसका उद्देश हिंदू देशाभिमान निष्क्रिय करना था . ताके देश के विभाजन करणे वाले गांधी नेहरू पर हिंदुस्तानीयोन्का कहर ना बरसे . मतलब हिंदूवो मे ऐसा भ्रम फैलाया गया कि तुम्हारी संस्क्रुती और धर्म मे सबकुछ गलत है.तो तुम किस आधार पर एक हो जाओगे ?तुम्हारी कोई गौरवशाली परंपरा नही है,तुम भिन्न हो एक नही . बारीकीसे देखा जाये तो स्वातंत्र्योत्तर ऐसी भावना फैलाने से हिंदू कि यांनी देश के ९०% लोगोंकी एकता लगभग नष्ट करके उनपर आरक्षण अस्त्र दागा गया ताके वह जाती पाती मे बट जाये.और एक होकर प्रतिकार ना कर सके गांधी नेहरू के देश विरोधी नीतियों का . इसी के तहत आज कोई भी उठकर करता है -
हिंदु श्रद्धा विरोध
आज कोई भी हिंदू श्रद्धा पर हमला करता है और कानून कि मदत से परंपरा को कुचल देता है गिने चुने लोग और संघटना के अतिरिक्त उन्हे कोई विरोद्ध भी नही करता ,क्यू की स्वतंत्रता के बाद बनाई गयी व्यवस्था ने हिंदू वो के मन मे अपनी ही संस्कृती के प्रती ऐसी हीनत्व(अपराधित्व ) कि भावना भर दि है, कि हिंदू प्रतिकार शून्य हो गये -मतलब तुम्हारे धर्म -संस्कृती मे सब कुछ गलत है, इस झूट का प्रचार और प्रसार प्रशासन ,मिडिया ,और उनके पाले हुवे लेखक तथा बुद्धिमान कहे जाणे वाले लोगो ने बडे ही धुर्तता से किया .यह लोग हिंदू वो को कभी हिंदू नही कहते,इसके बजाय ,RSS,संघी ,कहते है शनी मंदिर परंपरा बचाने वालो को सिर्फ ''गाव वाले'' कह कर उनकी संख्या सीमित है ऐसा जताते है , लेकीन हिंदू परंपरा तोडणे पर जो आमादा है उनके लिये बडा संख्यावाचक विशेषण जैसे नारी शक्ती, ''देश कि जनता'' आदी शब्दो का इस्तेमाल करते है . हिंदू संस्कृती को निष्प्रभ करणे के लिये ऐशी चालाकी १९४७से हि शुरू की गयी है . शायद इसी के तहत बडी हुशारी से हिंदू-संस्कृती का द्वेष करणे वाले नेता को 'संविधान 'रचेता बनाया गया .अगर ये झूट होता ,तो मुस्लीम पर्सनल कानून को भी हात लगाकर उनके धर्म मे भी हस्तक्षेप किया जाता लेकीन वास्तव मे इसके ठीक विपरीत होते दिखता है. समान नागरी संहिता के बारे मे आज तक कि सरकारे यही कहती आयी है कि ऐसा कानून सिर्फ मुसलमानो के सहमती से हि बनेगा .
दुनिया का हर देश अपनी अपनी संस्कृती को संविधान और प्रशासन मे समिलीत करता है,ब्रिटेन को प्रजातंत्र कि जननी माना जाता है . लेकीन वहा पर आज भी ''क्वीन'' जो राजशाही का प्रतिक है उसे केवल उनकी परंपरा का समान करणे के लिये सिर्फ बरकरार हि नही रखा ,अपितु उसके नाम पर , राष्ट्र का कारोबार किया जाता है . भारत हो या नेपाल इन देशो के सांस्कृतिक वंशज (वारीश ) सिर्फ हिंदू है,लेकीन ''राष्ट्र और संस्कृती के बीच मे जो संबध होता है ,उसका ज्ञान बहोत कम हिंदुवो को होता है ,इसिका फायदा देश विरोधी और स्वार्थी तत्व उठाते है ,वास्तव मे जिस भूमी पर जो संस्कृती आपने आप बनती है उसी संस्कृती का वह राष्ट्र होता है यह नियम दुनिया भर मे लागू है,क्यू कि यह निसर्ग निर्मित व्यवस्था है ,यह व्यवस्था सुक्ष्मजीव जंतू वो से लेकर हर प्राणी मे पायी जाती है . अपना इलाका सभालने की ,उसेअपने शरीर गंध (बाघ शेर मल मूत्र से अपने इलाखे कि सीमा बना ते है )से अंकित करणे कि प्रेरणा होती है . धब्बे नुमा बक्टेरिया कि कॉलोनी को बक्टेरिया ''कॅल्चर'' हि कहते है
भारत स्व-तंत्र हुवा .लेकिन क्या सचमुच 80% लोगो को स्व- तंत्र मिला ? जी नही देश को मिला नेहरू-आंबेडकर तंत्र यांनी नेआ तंत्र . हमारे पूर्वजो की जीवन और शासन के बारे मे जो समझदारी या ज्ञान था उसको को संविधान से दूर रखने या निकालने के पहले क्या किसीने जनता से पुछा था? क्या लोगो से जनादेश लिया था ? नही तो फिर ये लोग प्रजातंत्र वादी कैसे हो गये ? बुरी हो या भली हो हिंदू संस्कृती तब तो ९०% लोगो कि थी-
उस संस्कृती पर थोडा बहूत नया संस्कार कर के अगर संविधान बनता तो-
आज हिंदू वो के पूजा पद्धती मे -कोई काँग्रेसी बुद्धिवादी हस्तक्षेप नही कर सका होता .
(जैसे -शनि मंदिर -नारी प्रवेश अगर इस बात पर हिंदू नारी जनमत लिया तो ९९. ९९% हिंदू नारीया परंपरा के पक्ष मे मत देगी ,
लेकिन आंबेडकरकृत संविधान जो हिंदू संस्कृती नष्ट करणे के हिसाब से डिझाईन किया गया है उस पर आधारित कानून हिंदू परंपरा के विरुद्ध अगर ०.०९%लोग भी खडे होते है तो उनकी रक्षा करता है और प्रतिकार करणे वाले हिंदूवो को बेरहमि से खदेड देता है) संविधान अगर 'हिंदूस्थानी' होता तो ,हिंदू संस्कृती को हेरिटेज माना जाता ऐसेमे ईशपूजा की विभिन्न हिंदू परंपरावोंपर न्यायालय दवारा हस्तक्षेप नही होता और ना ही कोई भारत माता कि जय कहने को /या वन्दे मातरम को चलेंज करता . आतंकवाद तो बहोत दूर रहता देश को खोकला करणे वाला आरक्षण वाद और उससे उत्पन्न करप्शन यांनी काँग्रेसवाद पनपता हि नही . यही व्यवस्था दुसरी तरफ देश हित के खिलाप जाणे वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ को हात भी नही लगाता- ख्रिस्चन और मुस्लिम संस्था वो द्वारा सरकारी खर्च पर उनकी धर्म और परंपरा कि शिक्षा देने का इंतजाम किया जाता है सिर्फ हिंदू परंपरा पर स्वयं घोषित संविधानरक्षक,मिडिया और कानून जब जब मोका
मिलता है टूट पडते है .
दर असल आज जो हो रहा है इसका मूल गांधीवाद नामक पाखंड मे है,जिसका उद्देश हिंदू देशाभिमान निष्क्रिय करना था . ताके देश के विभाजन करणे वाले गांधी नेहरू पर हिंदुस्तानीयोन्का कहर ना बरसे . मतलब हिंदूवो मे ऐसा भ्रम फैलाया गया कि तुम्हारी संस्क्रुती और धर्म मे सबकुछ गलत है.तो तुम किस आधार पर एक हो जाओगे ?तुम्हारी कोई गौरवशाली परंपरा नही है,तुम भिन्न हो एक नही . बारीकीसे देखा जाये तो स्वातंत्र्योत्तर ऐसी भावना फैलाने से हिंदू कि यांनी देश के ९०% लोगोंकी एकता लगभग नष्ट करके उनपर आरक्षण अस्त्र दागा गया ताके वह जाती पाती मे बट जाये.और एक होकर प्रतिकार ना कर सके गांधी नेहरू के देश विरोधी नीतियों का . इसी के तहत आज कोई भी उठकर करता है -
हिंदु श्रद्धा विरोध
आज कोई भी हिंदू श्रद्धा पर हमला करता है और कानून कि मदत से परंपरा को कुचल देता है गिने चुने लोग और संघटना के अतिरिक्त उन्हे कोई विरोद्ध भी नही करता ,क्यू की स्वतंत्रता के बाद बनाई गयी व्यवस्था ने हिंदू वो के मन मे अपनी ही संस्कृती के प्रती ऐसी हीनत्व(अपराधित्व ) कि भावना भर दि है, कि हिंदू प्रतिकार शून्य हो गये -मतलब तुम्हारे धर्म -संस्कृती मे सब कुछ गलत है, इस झूट का प्रचार और प्रसार प्रशासन ,मिडिया ,और उनके पाले हुवे लेखक तथा बुद्धिमान कहे जाणे वाले लोगो ने बडे ही धुर्तता से किया .यह लोग हिंदू वो को कभी हिंदू नही कहते,इसके बजाय ,RSS,संघी ,कहते है शनी मंदिर परंपरा बचाने वालो को सिर्फ ''गाव वाले'' कह कर उनकी संख्या सीमित है ऐसा जताते है , लेकीन हिंदू परंपरा तोडणे पर जो आमादा है उनके लिये बडा संख्यावाचक विशेषण जैसे नारी शक्ती, ''देश कि जनता'' आदी शब्दो का इस्तेमाल करते है . हिंदू संस्कृती को निष्प्रभ करणे के लिये ऐशी चालाकी १९४७से हि शुरू की गयी है . शायद इसी के तहत बडी हुशारी से हिंदू-संस्कृती का द्वेष करणे वाले नेता को 'संविधान 'रचेता बनाया गया .अगर ये झूट होता ,तो मुस्लीम पर्सनल कानून को भी हात लगाकर उनके धर्म मे भी हस्तक्षेप किया जाता लेकीन वास्तव मे इसके ठीक विपरीत होते दिखता है. समान नागरी संहिता के बारे मे आज तक कि सरकारे यही कहती आयी है कि ऐसा कानून सिर्फ मुसलमानो के सहमती से हि बनेगा .
दुनिया का हर देश अपनी अपनी संस्कृती को संविधान और प्रशासन मे समिलीत करता है,ब्रिटेन को प्रजातंत्र कि जननी माना जाता है . लेकीन वहा पर आज भी ''क्वीन'' जो राजशाही का प्रतिक है उसे केवल उनकी परंपरा का समान करणे के लिये सिर्फ बरकरार हि नही रखा ,अपितु उसके नाम पर , राष्ट्र का कारोबार किया जाता है . भारत हो या नेपाल इन देशो के सांस्कृतिक वंशज (वारीश ) सिर्फ हिंदू है,लेकीन ''राष्ट्र और संस्कृती के बीच मे जो संबध होता है ,उसका ज्ञान बहोत कम हिंदुवो को होता है ,इसिका फायदा देश विरोधी और स्वार्थी तत्व उठाते है ,वास्तव मे जिस भूमी पर जो संस्कृती आपने आप बनती है उसी संस्कृती का वह राष्ट्र होता है यह नियम दुनिया भर मे लागू है,क्यू कि यह निसर्ग निर्मित व्यवस्था है ,यह व्यवस्था सुक्ष्मजीव जंतू वो से लेकर हर प्राणी मे पायी जाती है . अपना इलाका सभालने की ,उसेअपने शरीर गंध (बाघ शेर मल मूत्र से अपने इलाखे कि सीमा बना ते है )से अंकित करणे कि प्रेरणा होती है . धब्बे नुमा बक्टेरिया कि कॉलोनी को बक्टेरिया ''कॅल्चर'' हि कहते है
भारत स्व-तंत्र हुवा .लेकिन क्या सचमुच 80% लोगो को स्व- तंत्र मिला ? जी नही देश को मिला नेहरू-आंबेडकर तंत्र यांनी नेआ तंत्र . हमारे पूर्वजो की जीवन और शासन के बारे मे जो समझदारी या ज्ञान था उसको को संविधान से दूर रखने या निकालने के पहले क्या किसीने जनता से पुछा था? क्या लोगो से जनादेश लिया था ? नही तो फिर ये लोग प्रजातंत्र वादी कैसे हो गये ? बुरी हो या भली हो हिंदू संस्कृती तब तो ९०% लोगो कि थी-
उस संस्कृती पर थोडा बहूत नया संस्कार कर के अगर संविधान बनता तो-
आज हिंदू वो के पूजा पद्धती मे -कोई काँग्रेसी बुद्धिवादी हस्तक्षेप नही कर सका होता .
(जैसे -शनि मंदिर -नारी प्रवेश अगर इस बात पर हिंदू नारी जनमत लिया तो ९९. ९९% हिंदू नारीया परंपरा के पक्ष मे मत देगी ,
लेकिन आंबेडकरकृत संविधान जो हिंदू संस्कृती नष्ट करणे के हिसाब से डिझाईन किया गया है उस पर आधारित कानून हिंदू परंपरा के विरुद्ध अगर ०.०९%लोग भी खडे होते है तो उनकी रक्षा करता है और प्रतिकार करणे वाले हिंदूवो को बेरहमि से खदेड देता है) संविधान अगर 'हिंदूस्थानी' होता तो ,हिंदू संस्कृती को हेरिटेज माना जाता ऐसेमे ईशपूजा की विभिन्न हिंदू परंपरावोंपर न्यायालय दवारा हस्तक्षेप नही होता और ना ही कोई भारत माता कि जय कहने को /या वन्दे मातरम को चलेंज करता . आतंकवाद तो बहोत दूर रहता देश को खोकला करणे वाला आरक्षण वाद और उससे उत्पन्न करप्शन यांनी काँग्रेसवाद पनपता हि नही . यही व्यवस्था दुसरी तरफ देश हित के खिलाप जाणे वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ को हात भी नही लगाता- ख्रिस्चन और मुस्लिम संस्था वो द्वारा सरकारी खर्च पर उनकी धर्म और परंपरा कि शिक्षा देने का इंतजाम किया जाता है सिर्फ हिंदू परंपरा पर स्वयं घोषित संविधानरक्षक,मिडिया और कानून जब जब मोका


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