पुरस्कार वापस क्यों कर रहे है लेखक (,साहित्यकार)

       पुरस्कार वापस क्यों कर रहे है लेखक (,साहित्यकार)
       आरक्षण और करप्शन  का  युग अब खत्म हो ने जा रहा है .इस प्रक्रिया को अब कोई रोक नही सकता. यही हताशा है. पुरस्कार लौटाने कि मानसिकता के पीछे . डार्विन के सिद्धांत के ठीक उल्टा चलनेवाली ''आरक्षण  और करप्शन ''नीतीयो की शुरुवात  xxxxx  और xx और उनके रिकमंडेशनसे पदप्राप्त  XXX ने  कियी  थी . इन नितियो के तहत जिसमे  गुणावता है उसको पद या सम्मान  से  दूर रखकर  उसकी जगह कम काबिल व्यक्ती को कभी  आरक्षण तो कभी  करप्शन(रिकमंडेशन) से  बिठाया जाता रहा.  कहने को क्या?वे तो कुछ भी कारन  दे सकते है .
 लेकिन असल  वे तो  शर्म के मारे  पुरस्कार (सम्मान ) वापस कर रहे है.
      कहते है धार्मिक कट्टरता वाद बढने के कारन  वो ऐसा कर रहे है   ,साफ साफ क्यो नही कहते
    हिंदू कट्टरता वाद बढा है .  लेकिन ऐसा कहने से उनकी दोहरा पण तुरंत दिखाई देता है .लोग तुरंत पुछेंगे जब मुंबई मे हुतात्मा स्मारक की विटंबना 'भाई लोगो ने कि थी -
                        क्या तब आप पैदा हि नही हुये थे?
तब कहेंगे वो भी कट्टर ता है लेकिन उसका कोई धर्म नही होता. उनके द्वारा  जब हजारो मारे जा  रहे है ,वो क्या किडे मकोडे है? उनके मौत के  प्रती  साहित्यकार होते हुवे भी ,आपकी कोई संवेदना ,सहानुभूती नही । इनका एक तकिया कलाम है ''  सभी धार्मिक  कट्टरताये एक सी होती है -
   कैसे क्या एक सी होती है ? किसी कट्टरता ने एक साल मे हजारो मारे और दुसरे समूह ने हजारो सालो मे एक दो मारे तो दोनो एक जैसे हो जाएंगे क्या ?(किसी  को मारणे का हम समर्थन  नही करते,लेकिन दोहरापन  देखिये ) . ऐसे  ''आरक्षण और करप्शन" वाली पिछलि  सरकार के चाटुकारो के दिन अब खत्म हो गये है ,प्रसिद्धी पाने का इन्हे अब और  कोई चान्स नही है इस लिये पुरस्कार वापस कर के ध्यान आकर्षित करने कि कोशिश कर रहे है बेचारे . कर ने दो servival of the fittest के लिये जगह तो बन जायेगी .                   
         

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