दुनिया का सबसे बडा ढोंग,पाखंड या सबसे बडी चीटिंग क्या है?

दुनिया का सबसे बडा ढोंग,पाखंड या सबसे बडी चीटिंग क्या है?

दुनिया का सबसे बडा ढोंग,पाखंड या सबसे बडी चीटिंग क्या है ,जानते हो ? यह  लाईन --’’मजहब नही सिखाता आपस मे बैर  रखना ‘’जी हां यही  है .क्या यह हर मजहब पर लागू होता है ?
 हर साल ,हर महिने ,हर दिन सैंकडो ,हजारो भी नही ;कुल मिलाकर लाखो लोग  मजहब के नाम ( वस्तुतः आदेश) पर मारे जा रहे है ,वह भी एक देश ,दो देश ,तीन चार देशो मे होता ,तो कोई मान लेता  की यह  कोई गिने चुने  सरफिरे लोग है जो धर्म का अर्थ गलत लगा रहे  लेकिन  यह कैसे संभव हो सकता  कि एक साथ दुनिया के  लगभग सभी देशो मे एक धर्म विशिष्ट  के इतने सारे लोग अपने मजहब का  गलत अर्थ लगा रहे है ?.
इस खून खराबे के दोष से धर्म को बचाने के लिये दुनिया भर के राजनेता ,उस धर्म के समर्थक  और तथाकथित  विद्वान  कहते है धर्म का अर्थ, शांती है ,प्रेम है .  बाप रे ! कितना खतरनाक झूट है  यह .  जॉर्ज ओरवेल के सुप्रसिद्ध उपन्यास मे  युद्ध को ‘’शांती’’ और विरोधियों को ठिकाने लगानेवाले विभाग को ‘’प्रेम मंत्रालय’’इस तरह के नाम दिये हुये है . यह कुछ ऐसा  ही है  ना ?  इसी झूट के कारण मासूम लोगोंको बर्बरता पूर्वक मारा जा रहा है क्या मरणे वाले  और उनके भाई बंधु डिक्शनरी मे जो धर्म का अर्थ दिया है उसी को सही समझ  कर चले और मरते रहे? क्यो की इन्सानोंको मारने की प्रेरणा को दोषी ठहराने की   के बजाय अगर हम सिर्फ मारने वाले संघटन या व्यक्ती को दोष देकर उन्हे खत्म भी कर देते है तो क्या उसी प्रेरणा को लेकर बाद मे और वैसेही नये  हिंसक संघटन या लोग पैदा नही हो सकते ?यही तो हो रहा है ना ?
  ऐसे  किसी शब्द या तत्वज्ञान  का सही अर्थ उसके  द्वारा कौनसी कृतीया(actions) कि जाती हैं वही होता है  डिक्शनरी या विश्वकोषो मे या विद्वानोके विवेचन से तय नही होता.  
किसी छोटे बच्चे को चॉकलेट देने  के नाम पर बुलाया और बजाय चॉकलेट  के उसे थप्पड मारा तो दुबारा वह चॉकलेट  का अर्थ थप्पड ही  समझेगा,फिर चाहे उसे कितना भी समझावो कि चॉकलेट का डिक्शनरी मे दिया हुवा अर्थ मीठी ,स्वादिष्ट  गोली है. जितने गुणगान गाओगे चॉकलेट के ,उतना  ही  दूर वह भागेगा.
क्या ईश्वर कि व्याख्या या अर्थ हर धर्म के लिये अलग हो सकता है ?क्या ईश्वर उसके खास बंदों को  दुसरे समुदाय के लोंगो को मारने का आदेश दे सकता है ?और वह  भी महज इस लिये की वे अलग पद्धती से उसकी प्रार्थना ,उपासना या इबादत करते है ?  
  एकओर  मारने वाले खुद  कहते है हम अपने धर्म  के लिये यह पवित्र हत्याये कर रहे है तो दुसरी ओर मरने  वालो के नेता कहते है  उन हिंसाचारी यों का कोई धर्म ही  नही होता .हिंसाचारियो को उनके धर्म से बेदखल करने  वाले यह कौन होते है ?कितना पाखंड है यह. दुनिया  भर मे चल रहा है यह ढोंग ,यह चिटींग  है. इन नेताओ ने मासूम लोगोंका जुलमी तत्वज्ञान के खिलाफ लढ्ने का हतियार  ही नही नैतिक अधिकार भी छिन लिया है.
तथाकथित धर्म कोई भी हो जब तक उसके अनुयायी उसका पालन अपने आप मे करते है तब तक दुसरे धर्म  के लोग उसमे दखल नही दे सकते. मतलब वह ये कह सकते है के ‘’तुम अपने तरीकेसे हजार बार प्रार्थना करो हमे कोई एतराज  नही है लेकिन अगर तुम यह कहते  हो की मेरा धर्म तुम्हारा जीना स्वीकार नही करता ,तो उस तत्व का विरोद्ध करना हमारा  जन्म सिद्ध अधिकार है.’’ वैसे मनुष ही  नही हर प्राणी का पहला अधिकार जीवित रहना ही है. धर्म का मुख्य सूत्र भी वही है यांनी १) खुद  जीवित रहना मतलब   जीवित रहने  हेतू कोशिश करना.  धर्म का उसके बाद मे आनेवाला जो सूत्र आता है  वह पुरी दुनिया के मानवो के लिये है ना की किसी प्रदेश विशेष लोगो के लिये. और वह सूत्र है- २)  दुसरों को जीवित रहने के लिये  मदत करना .इसमेसे पहला सूत्र सिर्फ प्राणियों के लिये है . लेकिन मनुष के लिये पहला और दुसरा सूत्र मिला कर धर्म बनता है. यही है सनातन वैश्विक धर्म ,इसका फिलहाल ईश्वर से कोई लेना देना  नही है. कोई व्यक्ती या समाज इन दो तत्वो पर चलता है तो उसे धार्मिक कहना चाहिये ,जब कोई सिर्फ  सूत्र १ पर चलता है  और नंबर दो पर अंमल नही करता तो भी वह धर्म का पालन कर रहा है लेकिन वह प्राणी धर्म का पालन है मनुष धर्म नही.  लेकिन कोई किसी निरापराध मनुषको मारता है तब वह मनुष धर्म तो क्या प्राणी धर्म का भी पालन नही करता,क्यो की प्राणी भी अकारण हत्या नही करते . इसलिये वह अधर्म है . तात्पर्य धर्म का मतलब समस्त जीव मात्रों के लिये -’जिओ और जिने दो’ है ; लेकिन मानवता धर्म इसके भी आगे  है -
                    जिओ और जिने दो तथा जिने के लीये दुसरों की मदद करो !


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