ऑलिंपिक में अगर आरक्षण हो तो ?
हमारे देश में आरक्षण का बुखार कुछ इस तरह चढ़ गया है और इसी तरह चढ़ता गया तो लोग एक दिन '' ऑलिंपिक ''खेल में भी आरक्षण के लिए शायद आंदोलन करनेसे नहीं चूकेंगे। तब क्या होगा ?
आरक्षण वादी इसके लिए वाही घिसा पीटा तर्क देंगे जैसे --
हजारो साल से( शायद लाखो साल से भी -) हमारे पूर्वजो को इसमे जितने का मोका नहीं मिला।
कमजोरोंको आगे आने का मोका देने हेतु हर स्पर्धा में ५०% आरक्षण हो मसलन अगर १०० मी भागने कि स्पर्धा हो तो हमारे अंतिम रेखा ५० मी.पर लायी जाय ताकि सशक्त वर्ग का खिलाडी १०० मी पहुचने से पहले हम भी जित सके.
और खेलो में किस तरह आरक्षण हो यह हम पाठको कि कल्पना शक्ति पर छोड़ते है।
लेकिन यह बहोत हो गया ्ह मारा देश हर प्रकार के आरक्षण से ग्रस्त हो गया है। गावो में सरपंच पद के लिए जब आरक्षण द्वारा किसी जाती विशेष कि महिला को ही चुनना पड़ता है तो जरुरी नहीं होता कि वह पढ़ी लिखी हो लेकिन लोगो को उस जाती कि और कोई महिला ना मिलने कि वजह से उसको ही चुनना पड़ता है ऐसी महिलाये (उनका कोई कुसूर नहीं होता ) सिर्फ अंगूठा या हस्ताक्षर कि ही मालकिन होती है बाकी सब कारोबार उनके पुरुष करते है। आरक्षण में आरक्षण भी बड़ा कॉम्प्लीकेटेड होता है जैसे किसी अपाहिज के लिए आरक्षण है तो उसमे भी फ ला फला जाती का ही गूंगा या बहरा चाहिए होता है।
हमारे गाव के सरपंच पद कि लॉटरी एकबार लंगड़ों के लिए खुल गयी तो बहोत सारे उमिदवारो ने फॉर्म भरे उसमे से ज्यादातर दाये पाँव से अपाहिज थे उन सब के फॉर्म कैंसल हो गए और सिर्फ एक का ही फॉर्म वैध शाबित हुवा जिसे अविरोध विजयी घोषित किया गया बाद में पता चला कि लंगड़ों प्रवर्ग के अंदर वाली दो सब कैटेगरी में से सिर्फ बाए पांव के अपाहिजों के लिए ही वह आरक्षण था इस लिए दाए पांव वाले डीसक्वालिफाय हो गए।
ऐसी भी कहानिया बन सकती है !!
हमारे देश में आरक्षण का बुखार कुछ इस तरह चढ़ गया है और इसी तरह चढ़ता गया तो लोग एक दिन '' ऑलिंपिक ''खेल में भी आरक्षण के लिए शायद आंदोलन करनेसे नहीं चूकेंगे। तब क्या होगा ?
आरक्षण वादी इसके लिए वाही घिसा पीटा तर्क देंगे जैसे --
हजारो साल से( शायद लाखो साल से भी -) हमारे पूर्वजो को इसमे जितने का मोका नहीं मिला।
कमजोरोंको आगे आने का मोका देने हेतु हर स्पर्धा में ५०% आरक्षण हो मसलन अगर १०० मी भागने कि स्पर्धा हो तो हमारे अंतिम रेखा ५० मी.पर लायी जाय ताकि सशक्त वर्ग का खिलाडी १०० मी पहुचने से पहले हम भी जित सके.
और खेलो में किस तरह आरक्षण हो यह हम पाठको कि कल्पना शक्ति पर छोड़ते है।
लेकिन यह बहोत हो गया ्ह मारा देश हर प्रकार के आरक्षण से ग्रस्त हो गया है। गावो में सरपंच पद के लिए जब आरक्षण द्वारा किसी जाती विशेष कि महिला को ही चुनना पड़ता है तो जरुरी नहीं होता कि वह पढ़ी लिखी हो लेकिन लोगो को उस जाती कि और कोई महिला ना मिलने कि वजह से उसको ही चुनना पड़ता है ऐसी महिलाये (उनका कोई कुसूर नहीं होता ) सिर्फ अंगूठा या हस्ताक्षर कि ही मालकिन होती है बाकी सब कारोबार उनके पुरुष करते है। आरक्षण में आरक्षण भी बड़ा कॉम्प्लीकेटेड होता है जैसे किसी अपाहिज के लिए आरक्षण है तो उसमे भी फ ला फला जाती का ही गूंगा या बहरा चाहिए होता है।
हमारे गाव के सरपंच पद कि लॉटरी एकबार लंगड़ों के लिए खुल गयी तो बहोत सारे उमिदवारो ने फॉर्म भरे उसमे से ज्यादातर दाये पाँव से अपाहिज थे उन सब के फॉर्म कैंसल हो गए और सिर्फ एक का ही फॉर्म वैध शाबित हुवा जिसे अविरोध विजयी घोषित किया गया बाद में पता चला कि लंगड़ों प्रवर्ग के अंदर वाली दो सब कैटेगरी में से सिर्फ बाए पांव के अपाहिजों के लिए ही वह आरक्षण था इस लिए दाए पांव वाले डीसक्वालिफाय हो गए।
ऐसी भी कहानिया बन सकती है !!

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